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The lost trip: Nostalgia 2

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 a wondering view extracted from this trip☺ ......  शाम को स्कूल आते ही हमारे  गांव के एक्सपेरिएंस शेयर करने के लिए एक सेशन रखा गया। हम सब पूरा दिन वैसे भी काफी थक गए थे पर अब कुछ कर  नहीं सकते थे। कुछ आधे या एक घंटे बाद सेशन शुरू हुआ। सबने अपने -अपने एक्सपेरिएंस बताये ,सुन कर काफी अच्छा लग रहा था क्योकि सब अलग अलग जगह गए थे तो किसी ने हल चलाया ,कोई पानी से भीग के आया तो कोई रास्तो पर गिर गिर कर आया। मेरा भी बोलने का काफी मन था ,मैं क्या सारे कुछ न कुछ बोलना चाह रहे थे पर काफी टाइम होता जा रहा था तो मैंने सोचा छोड़ो ,क्योकि भूख बड़ी तेज़ लगी थी। चलो फिर खाना वाना भी हो गया उस रात सुब काफी थके थे तो जल्दी ही सो गए।  Next day... सुबह योग  से  दिन शुरू हुआ। आज मैं तो कुछ जल्दी ही मैदान में पहुंच गया था क्योकि आखिरी रात को हमने तय किया था  कि  हमारा ग्रुप सबसे पहले मैदान में पहुंच कर अपना स्लोगन बोल देगा जिससे हमे एक्स्ट्रा पॉइंट मिल जाएँ।,पर मेरे आलावा कोई वहां जल्दी पंहुचा ही नहीं। ऎसे ही फिर कुछ सेशन्स चले और शाम को खेल वागैरा भी च...

The lost trip: Nostalgia

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२ जून ,३जून २०१८ मै , शुभ , अमन और यशस्वी हम चार स्कूल  से संकल्प शिविर जोकि उत्तरकाशी में होने वाला था ।वहां के लिए निकले तकरीबन २:३० बजे दोपहर को हमारी बस लखीमपुर से बरेली के लिए थी। फिर बरेली से करीब १० बजे रात को हरिद्वार के लिए। सुबह हरिद्वार पहुंच कर हम सब ने ब्रेकफास्ट किया और वहां से 7 बजे की बस पे जोकि उत्तरकाशी के लिए थी । उससे रवाना हुए । हरिद्वार से पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है । तो रास्ते में हो बहुत मजा आया हालाकि मै वहां कई बार जा चुका हूं फिर भी दोस्तो के साथ और भी मज़ा आता है। रास्ते के एक तरफ नदी और दूसरी तरफ आकाश को चूमती हुई चोटियां । शाम को करीब 7 बजे हम संकल्प शिविर में पहुंचे जोकि उत्तरकाशी से 10 किलोमीटर दूर मनेरी के एक स्कूल में लगा था। वहां पहुंच कर हमे अपना एक रूम मिल गया जोकि बड़ी जर्जर अवस्था में था फिर भी बहुत अच्छा था । वहां और भी कई जगहों से स्टूडेंट्स आए थे । उसके बाद हमे पता चला कि उसी शाम को ही हम सभी स्टूडेंट्स और टीचर्स का सेशन होगा । तो कुछ देर बाद मै और सभी एक हाल मै पहुंचे । वहां कई विशिष्ट हस्ताक्षर हमारे मार्गदर्शन के लिए आए थे। हम सभी अल...

22 July

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पहुंच पहुंच कर जाने कहां पहुंच गए हम, ये भी ना देखा कि कहां पहुंच गए हम, पहुंचना था जहां वहां तो कोई और ही पहुंच गया, पहुंचने से पहले तो मंज़िल चुनी थी हमने,  पर जहां नहीं पहुंचना था शायद वह पहुंच गए हम।

scattered clouds!

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कभी कभी प्रकृति से घुलना मिलना भी काफी सुखद अहसास प्रदान कराता है कभी कभी यूहीं बिना किसी कारण के ही सड़कों पर निकल जाना भी अद्भुत अनुभूतियां कराता है कभी कभी किसी अनजान इंसान का  दोस्ताना भी संबंध बनते बनते रहा जाया करता है कभी कभी वो संबंध उस इंसान के बगैर भी कायम हो जाया करता है कभी कभी इतना सब कुछ हो जाता है और किसी को कुछ होने का अहसास भी नहीं होता है।